An Overview of the Value Consciousness of the Bhakti Movement in India

भारत में भक्ति आन्दोलन की मूल्य चेतना का अवलोकन (https://doi.org/10.5281/zenodo.23005628)

Authors

  • Dr. Jay Prakash Singh Author

Keywords:

मूल्य चेतना, पुरोहितवाद, भक्ति आंदोलन, लोकवृत्त, खंडनात्मक शैली, मध्यकाल।

Abstract

भारत में भक्ति आंदोलन केवल एक धार्मिक या सामाजिक घटना नहीं थी, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक और नैतिक पुनर्जागरण की सबसे प्रबल धारा थी। मध्यकाल (विशेष रूप से 8वीं से 17वीं शताब्दी) के दौरान दक्षिण भारत से अलवार और नायनार संतों द्वारा प्रारंभ हुई यह धारा उत्तर भारत तक फैल गई और समाज के हर वर्ग को स्पंदित किया। भक्ति आंदोलन की ‘मूल्य चेतना’ सामाजिक, नैतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का एक ऐसा समावेश थी, जिसने समाज की जड़ता को तोड़कर मानवीय संवेदनाओं को केंद्र में रखा हैं। भक्त कवियों की वाणी में रचनात्मक मूल्य चेतना है। भक्ति आन्दोलन की लोक जागरणवादी परंपरा में हम पाते हैं कि अधिकांश रचनाकारों की रचनाओं में मानवीय पीड़ा का बोध बहुत गहरा है। सामाजिक अंतर्वस्तु में बदलाव और परिवर्तन के लिए संतो की सक्रियता देखते बनती है। इनका उद्देश्य ऐसे जीवन मूल्यों का प्रतिपादन करना था जिससे पुरोहितवाद, पुराणवाद, कर्मकाण्डवाद आदि के चलन को कम किया जा सके। अपमानित जीवन जीने को अभिशप्त निचले वर्ग में आत्मविश्वास पैदा करने और विश्वास को कायम रखने के लिए संतो ने विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया और जनता तक अपने सन्देश पहुंचाते रहे। इन संत रचनाकारों ने अपने चिंतन और साहित्य से भारतीय समाज एवं संस्कृति के इस सत्य को ध्वनित किया कि ईश्वर के समक्ष न कोई छोटा है न कोई बड़ाय उसकी नजर में सभी मनुष्य बराबर हैं। समतामूलक दृष्टि के द्वारा समाज में परिवर्तन लाने के लिए संतों ने व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर कई प्रयास किए।

Author Biography

  • Dr. Jay Prakash Singh

    Assistant Professor (History), Government Girl's Post-Graduate College, Banda, Uttar Pradesh

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Published

2026-09-30

How to Cite

An Overview of the Value Consciousness of the Bhakti Movement in India: भारत में भक्ति आन्दोलन की मूल्य चेतना का अवलोकन (https://doi.org/10.5281/zenodo.23005628). (2026). Bundelkhand Journal of Academic Research, 2(3). https://bjar.in/index.php/bjar/article/view/59